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कक्षा

प्लूटो की कक्षा का आकार और उसका क्रांतिवृत्त से झुकाव उसकी कक्षा की मुख्य विशेषताएं है । यदि सौरमंडल को ऊपर की ओर से देखा जाय तो आप पायेंगे कि सभी ग्रहों की कक्षाएं वृत्ताकार है | किंतु प्लूटो की कक्षा एकदम भिन्न है | प्लूटो की कक्षा अत्यधिक अण्डाकार है | अपनी अंडाकार कक्षा पर भ्रमण करते हुए सूर्य की एक पूर्ण परिक्रमा के लिए प्लूटो को 248 साल लगते हैं | इस यात्रा के दौरान प्लूटो कक्षा के प्रत्येक बिंदु पर सूर्य से भिन्न-भिन्न दूरी रखता हैं | सूर्य से कक्षा का निकटतम बिंदु 30 AU दूरी पर, जबकि कक्षा का दूरतम बिंदु 39 AU पर है | प्लूटो की अंडाकार कक्षा नेपच्यून की तुलना में ज्यादा चपटी है और इसलिए कभी कभी यह नेप्च्यून की कक्षा के भीतर तक चली जाती है | यही कारण है कि 20 वर्षों के लिए नेपच्यून की बजाय प्लूटो सूर्य से करीब होता है | पिछली बार यह अवधि 7 फरवरी 1979 से 11 फरवरी 1999 तक बरकरार रही थी | पिछली परिक्रमा में यह स्थिति सन् 1700 में बनी थी | प्लूटो की झुकी कक्षा उसे कुछ असामान्य विशेषताएं देती है | साधारणतया सभी ग्रहों की कक्षाएं एक ही तल के आसपास मौजूद है जबकि प्लूटो की कक्षा अत्यधिक झुकाव लिए हुए है | इसका मतलब यह है कि प्लूटो शेष सौरमंडल की तरह एक ही तल के भीतर नहीं रहता है | इसके बजाय प्लूटो 17 डिग्री के कोण पर परिक्रमा करता है | अपनी कक्षा के एक भाग पर जहां प्लूटो क्रांतिवृत्त के ऊपर होता है, वहीं बाकी समय वह इस तल के नीचे होता है | क्रांतिवृत्त वह काल्पनिक तल है जिस पर पृथ्वी की कक्षा स्थित है और लगभग सभी ग्रहों की कक्षाएं क्रांतिवृत्त के समीप है |

अपने कम द्रव्यमान के साथ, प्लूटो की कक्षा नेप्च्यून के प्रभाव के कारण वास्तव में काफी हद तक अनिश्चित बनी रहती है | हालांकि खगोलविद प्लूटो स्थिति की भविष्यवाणी अतीत और भविष्य के कुछ लाख सालों के लिए कर सकते हैं, पर सुदूर भविष्य के लिए प्लूटो की ठीक ठीक स्थिति बता पाना असंभव है | 

 प्लूटो और नेप्च्यून की कक्षीय अवधियों के बीच आपस में 3:2 का एक निश्चित गणितीय अनुपात है | इसका अर्थ है कि जितने समय में नेप्च्यून सूर्य के तीन चक्कर लगाता है, प्लूटो ठीक दो चक्कर लगाता है | यह दौर हमेंसा समान स्थिति में ख़त्म होता है | इस वजह से प्लूटो की नेप्च्यून के साथ कभी टक्कर नहीं होगी | यह पूरी प्रक्रिया पूर्ण होने के लिए लगभग 500 वर्ष लेती है |

प्लूटो का द्रव्यमान उसकी अपनी कक्षा में मौजूद अन्य समस्त सामग्री का केवल 0,07 गुना है | तुलना के लिए, पृथ्वी का द्रव्यमान उसकी कक्षा में स्थित कुल मलबे का १५ लाख गुना है | चूँकि प्लूटो अपनी कक्षा की इस सामग्री को साफ़ नहीं कर सका, इसलिए इसे एक बौने ग्रह के रूप में नामित किया गया है |


प्लूटो की झुकी हुई कक्षा लाल रंग में 

वायुमंडल

ग्रहों को घेरे हुए गैसीय आवरण को वायुमंडल कहते है। प्लूटो पर बेहद विरल वायुमंडल है | वायुमंडल मुख्य रूप से नाइट्रोजन से तथा शेष मीथेन व  कार्बनडाई ऑक्साईड से मिलकर बना है | नाइट्रोजन के गैसीय रूप को स्पेक्ट्रोस्कोपी से पहचानना बहुत मुश्किल होने से प्लूटो के बनावट की कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है | वैज्ञानिकों को लगता है कि नाइट्रोजन वायुमंडल का मुख्य घटक है | सूर्य से दूरी वायुमंडल को प्रभावित करती है,  दूरी बदलते ही मौसम बदल जाता है | प्लूटो एक बर्फीला पिंड है | सूर्य के करीब आने पर बर्फ के वाष्पीकरण से वातावरण गैसीय हो जाता है । इसके विपरीत दूर जाने पर वातावरण जम जाता है और जमी वायु धरातल पर हिमपात के रूप में बरसती है | तत्पश्चात प्लूटो पर कोई वायुमंडल नहीं रह जाता है | 1989 में प्लूटो सूर्य से सर्वाधिक करीब था । तब अधिकांश सतह के तपन से वातावरण अपने चरम पर पहुँच गया था | वैज्ञानिकों का अनुमान है कि प्लूटो का तापमान 2015 तक इसके दक्षिणी गोलार्ध में निरंतर बढ़ता रहेगा |

प्लूटो पर वातावरण की कलात्मक छवि 

खोज

रात्रि आकाश में प्लूटो को देखना रेत के ढेर में सुई ढुंढने के समान है। प्लूटो बेहद छोटा पिंड है। यहाँ तक कि कई उपग्रहों, यथा आयो, गेनीमेड, कैलिस्टो, टाइटन, ट्रीटोन, चन्द्रमा से भी छोटा है। इसे  केवल बड़ी शक्तिशाली दूरबीनों की मदद से ही देखा जा सकता है। बड़ी दूरबीनों से भी यह महज तारों जैसा ही नजर आता है। इस बात में कोई शक नहीं कि प्लूटो को देखना दुष्कर कार्य है।

प्लूटो के खोजकर्ता क्लायड टॉमबैग 

प्लूटो की तरह उसकी खोज का सफ़र भी बेहद रोचक रहा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्लूटो को उसकी खोज से पहले ही पहचान लिया गया था। उसके अस्तित्व को हमने खोज के पूर्व ही भांप लिया था। नेप्चून की संदिग्ध गतिविधियों से इसका पूर्वाभास हो चुका था । खगोलविद् पेर्सिवाल लॉवेल युरेनस व नेप्चून का अध्ययन कर रहे थे | उन्होंने पाया कि सातवें और आठवें ग्रह की हलचल कुछ अजीब है। उन्हें लगा हो ना हो पीछे कोई ग्रह है जो इन पर अपना असर डाल रहा है। फिर उन्होंने संभावना के आधार पर इस नए ग्रह को खोजने की कोशिश की | लॉवेल की मृत्युपरांत, युवा खगोलविद् क्लायड टॉमबैग ने इस खोज को जारी रखा। वें एरिजोना की लॉवेल वेधशाला में कार्य कर रहे थे। उन्होंने दूरबीन के मुख को उस ओर मोड़ दिया जहां ग्रह के मिलने के सर्वाधिक आसार थे। एक से दो सप्ताहों तक निरंतर तस्वीरें लेने के बाद उन्होंने तस्वीरों का आपस में मिलान किया और पाया कि कुछ है जो पृष्ठभूमि सितारों के सापेक्ष हलचल दिखा रहा है। अंततः उन्होंने एक बिंदु पाया जो हिलता हुआ प्रतीत हो रहा था। यह बिंदु ही नया ग्रह था। इस तरह 1930 में प्लूटो की ऐतिहासिक खोज हुई।

उपग्रह

इक्कसवीं सदी में कई शक्तिशाली दूरबीनों का निर्माण हुआ | यहाँ तक कि अंतरिक्ष में भी दूरबीन को स्थापित किया गया | ऐसी ही एक दूरबीन है: हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी | हबल दूरबीन ने हमें 5 अरब किमी दूर स्थित छोटी से छोटी वस्तु को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम बनाया है | नासा ने इस दूरबीन से प्लूटो के कम से कम पांच उपग्रहों को खोज निकाला है, शैरन, निक्स और हाइड्रा इनमे से तीन है।  हाल ही में खोजे गए अन्य दो उपग्रहों को औपचारिक नाम P4 और P5 दिया गया है | खोजे गए चंद्रमाओं में P4 सबसे छोटा है, इसका अनुमानित व्यास 13 से 34 किमी है | इसकी तुलना में सबसे बड़े चन्द्रमा शैरन का व्यास 1,043 किमी, और निक्स व हाइड्रा का व्यास 32 से 113 किमी के परास में है | शैरन  की खोज 1978 में संयुक्त राज्य अमेरिका नौसेना वेधशाला स्टेशन, एरिज़ोना में हुई थी | तब प्लूटो को ग्रह का दर्जा प्राप्त था | अगले दो चन्द्रमा निक्स और हाइड्रा हबल दूरबीन की मदद से 2006 तक खोजे गए | चौथा चाँद P4 हबल के साथ 2011 में खोजा गया | P5 के बारे में फिलहाल कुछ ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है |

प्लूटो के उपग्रह

मान्यता

2006 से पूर्व तक प्लूटो एक ग्रह के रूप में वर्गीकृत था। अरसे तक यह मंगल व बुध जितना बड़ा ग्रह माना गया। पर 1970 में प्लूटो के सबसे बड़े चन्द्रमा शैरन की खोज ने इस धारणा को बदल दिया। खगोलविदों ने शैरन की परिक्रमा अवधि व प्लूटो से उसकी दूरी की गणना की। इस आधार पर प्लूटो व शैरन के संयुक्त द्रव्यमान का आकलन किया। उन्होंने पाया कि दोनों का साझा द्रव्यमान हमारे चन्द्रमा से भी कम है। प्लूटो का आकार समकालीन खोजे गए सौरमंडल के अन्य खगोलीय पिंडों के समकक्ष पाया गया। इस बात ने खगोलविदों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि आखिर प्लूटो है क्या ? कम से कम यह ग्रह तो नहीं है।

2006 में प्लूटो को ग्रहों की बिरादरी से निकल दिया गया।

आख़िरकार प्लूटो से ग्रह का दर्जा क्यों छीन लिया गया ? यह कहानी भी बड़ी रोचक है। सन 2006 में सैंकड़ों खगोलविद प्लूटो पर चर्चा के लिए पैरुग्वे में जुटे। लम्बी जद्दोजहद के बाद ग्रहों को सिरे से परिभाषित किया गया। साथ ही साथ 'वामन ग्रह' के रूप में एक अतिरिक्त नए वर्ग को भी जोड़ा गया। ग्रहों और वामन ग्रहों के लिए कुछ विशेष नियम बनाए गए। प्लूटो ने ग्रह होने की आवश्यक दो शर्तों को तो पूरा किया पर अंतिम शर्त पर वह खरा नहीं उतर सका। अंतिम नियम के अनुसार ग्रह की कक्षा से लगा क्षेत्र साफ़ सुथरा होना चाहिए अर्थात् कक्षा के आसपास अन्य कोई भी खगोलीय पिंड मौजूद नहीं होना चाहिए। प्लूटो कुइपर बेल्ट का सदस्य है जिसके आसपास बर्फीले खण्डों की भरमार है। नई परिभाषा के अनुसार प्लूटो ग्रह होने की पात्रता नहीं रखता था। आखिरकार प्लूटो को वामन ग्रह की श्रेणी में डाल दिया गया।