खोज
रात्रि आकाश में प्लूटो को देखना रेत के ढेर में सुई ढुंढने के समान है। प्लूटो बेहद छोटा पिंड है। यहाँ तक कि कई उपग्रहों, यथा आयो, गेनीमेड, कैलिस्टो, टाइटन, ट्रीटोन, चन्द्रमा से भी छोटा है। इसे केवल बड़ी शक्तिशाली दूरबीनों की मदद से ही देखा जा सकता है। बड़ी दूरबीनों से भी यह महज तारों जैसा ही नजर आता है। इस बात में कोई शक नहीं कि प्लूटो को देखना दुष्कर कार्य है।
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| प्लूटो के खोजकर्ता क्लायड टॉमबैग |
प्लूटो की तरह उसकी खोज का सफ़र भी बेहद रोचक रहा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्लूटो को उसकी खोज से पहले ही पहचान लिया गया था। उसके अस्तित्व को हमने खोज के पूर्व ही भांप लिया था। नेप्चून की संदिग्ध गतिविधियों से इसका पूर्वाभास हो चुका था । खगोलविद् पेर्सिवाल लॉवेल युरेनस व नेप्चून का अध्ययन कर रहे थे | उन्होंने पाया कि सातवें और आठवें ग्रह की हलचल कुछ अजीब है। उन्हें लगा हो ना हो पीछे कोई ग्रह है जो इन पर अपना असर डाल रहा है। फिर उन्होंने संभावना के आधार पर इस नए ग्रह को खोजने की कोशिश की | लॉवेल की मृत्युपरांत, युवा खगोलविद् क्लायड टॉमबैग ने इस खोज को जारी रखा। वें एरिजोना की लॉवेल वेधशाला में कार्य कर रहे थे। उन्होंने दूरबीन के मुख को उस ओर मोड़ दिया जहां ग्रह के मिलने के सर्वाधिक आसार थे। एक से दो सप्ताहों तक निरंतर तस्वीरें लेने के बाद उन्होंने तस्वीरों का आपस में मिलान किया और पाया कि कुछ है जो पृष्ठभूमि सितारों के सापेक्ष हलचल दिखा रहा है। अंततः उन्होंने एक बिंदु पाया जो हिलता हुआ प्रतीत हो रहा था। यह बिंदु ही नया ग्रह था। इस तरह 1930 में प्लूटो की ऐतिहासिक खोज हुई।

